सुलग रही थी जो आग दिल में
सुलग रही थी जो आग दिल में, करीब आके जला रहे हो।
लगी थिरकने ये मन की कलियाँ, कैसा जादू चला रहे हो।।
सुलग रही थी जो........
कदम हमारे हैं बहके बहके, जो रूप आंखों से पी लिया हूं,
नशा है मुझको अभी भी ज्यादा, शराब फिर क्यों पिला रहे हो।।
सुलग रही थी जो........
लहर सुनामी सी उठ रही है, हृदय के गहरे अथाह जल में,
डुबो के छोड़ेगीं आज हमको, बला ये कैसी बुला रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
सलाह देना सलाह लेना, अभी तलक ना है हमने सीखा,
कैसी सीरत कैसी शौकत, हमें यूं तोहमत लगा रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
ए हमने माना हसीं बहुत हो, हुनर खुदा ने है तुमको बख्शा,
गुलों में हलचल है आज भारी, नसीब किसका जगा रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"
लगी थिरकने ये मन की कलियाँ, कैसा जादू चला रहे हो।।
सुलग रही थी जो........
कदम हमारे हैं बहके बहके, जो रूप आंखों से पी लिया हूं,
नशा है मुझको अभी भी ज्यादा, शराब फिर क्यों पिला रहे हो।।
सुलग रही थी जो........
लहर सुनामी सी उठ रही है, हृदय के गहरे अथाह जल में,
डुबो के छोड़ेगीं आज हमको, बला ये कैसी बुला रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
सलाह देना सलाह लेना, अभी तलक ना है हमने सीखा,
कैसी सीरत कैसी शौकत, हमें यूं तोहमत लगा रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
ए हमने माना हसीं बहुत हो, हुनर खुदा ने है तुमको बख्शा,
गुलों में हलचल है आज भारी, नसीब किसका जगा रहे हो।।
सुलग रही थी जो.......
रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें