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जैसा बोया काट रहा है

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थूक  थूक  कर, चाट रहा है। जैसा  बोया,  काट  रहा  है।। नफरत की  इक  लंबी खाई, खुद खोदा, खुद पाट रहा है। रखना  मत  उम्मीदें   उससे, रख्खा क्या, जो बांट रहा है। लेकर  जुगनूँ   की  अंगड़ाई, सूरज  को  अब डांट रहा है। सर्वश्रेष्ठ   कहलाने   खातिर, अपनी जड़़  ही  छांट रहा है। कैसा अब वह, हुआ बावला, बिन गलती  के  डांट रहा है। लाल चकित ना होना उससे, उसका  ऐसा  ठाट  रहा  है।। रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल" 9452088890

उजाले हैं पड़े घायल

उजाले हैं पड़े घायल,                अंधेरे मन में ऐठे हैं। घुटन दिल में समाई है,              लिए हम भूख बैठे हैं।। चुभन रह रह के सीने में,              किए जाती हमें घायल, जलाती जिस्म गर्मी की,              लिए  बस धूप  बैठे  हैं। बँहक कर आ गए सपने,               छलावा  देके  जाते  हैं, तरासो  तोड़  दो  चाहे,               शिला का  रूप बैठे हैं। घड़ी भर के लिए खुशियां,               ठहरती ही नहींआंगन, मुहाने पर मेरे अगणित,               गमों  के  कूप  बैठे  हैं। दिलाने हक हमारा जो,                खड़े हैं शांत दर्शक बन, बताएंगे मिले मौका,                अभी...

दूरियाँ ही दवा हो गयी

हाय  कैसी  हवा  हो गयी।  दूरियां  ही  दवा  हो  गयी।।  बाद मुद्दत के जो थी मिली,  सब दुआएं खफा हो गयी।  कैसी  नाजुक   हुई जिंदगी,  मौत  की  मेहरबां हो गयी।  तेरे   कूचे से  मेरा गुजरना,  जान  पे ही  बला हो गयी।  जाँ  लुटाती  रहीं  वादियां,  अब सभी बेवफा हो गयी।  "लाल" प्यासे  रहे  झील में,  ये सजा आज क्या हो गयी।।   रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल" गोपालगंज,आजमगढ़

ना मस्जिद ना गिरजाघर ना हमें शिवाला देना

ना मस्जिद ना गिरजाघर ना हमें शिवाला देना। भूखा गरीब हूँ साहब  सिर्फ हमें  निवाला देना।। काटी है  जिन्दगी  हमने , बेबसी  के  अँधरो  में, सूरज न सही कम से कम,दिये का उजाला देना। उनके  वायदों  पर  जिंदा हूँ,आज भी अब भी, उसने  सीखा  कहां से, इस  तरह हवाला देना।। वो तो बुजदिल अनारी हैं,उसे क्या पता साहब, चालबाजी आपकी है,हथियार और माला देना।। चाबियाँ किस्मत की,गिरवी पड़ी है उनके पास, हमें याद है"लाल"सिर्फ,तकदीर पर ताला देना।। रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"

शाम ढली बस रात नहीं है

शाम  ढली  बस, रात  नहीं है। आज नयी  यह  बात  नहीं है।। आंख दिखाकर झुका वो देगा, यह  उसकी  औकात  नहीं  है। दोपहरी  भी,    रात     लगेगी, गर दिल  में  जज्बात  नहीं  है। छू  लो बढ़कर  मंजिल अपनी, समय का शह  है मात नहीं है। जीवन है  इक   प्रबल साधना, खुशियों   की  बारात  नहीं  है। रंग  लहू  का   सदा  "लाल" है, कोई    इसकी   जात  नहीं  है। दे  दूं  कैसे  दिल   का   टुकड़ा, देश   मेरा   खैरात    नहीं    है। रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल" गोपालगंज , आजमगढ़, मो. 9452088890

भावनायें नया गीत गाने लगी।

भावनायें   नया   गीत   गाने  लगी। पास आके वो' जब मुस्कराने लगी।। इन फिजाओं में जब पाँव उनके पड़े, हर  कली  जश्न  में डूब  जाने लगी।। उड़के आयी कहीं से मचलती पवन, डाल  की  पत्तियां  गुनगुनाने  लगी।। रूप को  देख  कर  रातरानी खिली, खुशबुओं  की  लड़ी दूर जाने लगी।। हौसलों के  समन्दर  मे हलचल हुई, बाँह में  वो  मेरे  जब  समाने  लगी।। ढूढती थी  नजर  जिन सवालात को, उन सवालों का हल लाल पाने लगी।। ✍️लालबहादुर चौरसिया लाल

दर्द मेंं मुस्कराना हमें आ गया

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दर्द में मुस्कुराना........हमें आ गया। याद  गुजरा  जमाना   हमें आ गया।। भावनाएं  थिरकने  लगीं  आजकल, ख्वाब दिल में सजाना हमें आ गया। रूठ जाए अगर वो तो कुछ ग़म नहीं, किस  कदर है  मनाना हमें आ गया। एक  अरसे  से  जो  गुनगुनाया  नहीं, प्यार  का  वो  तराना  हमें  आ गया। काट डालेगी नफरत की बुनियाद जो, तीर  ऐसा  चलाना...... हमें आ गया। आंसुओं  को  तुम्हारे  मैं  पी जाऊंगा, दोस्त  बनके  हंसाना  हमें  आ  गया। खिल  उठा  आज  मासूम चेहरा मेरा, ख्याल  साथी  पुराना  हमें  आ  गया। "लाल" रिश्ता कोई जोड़ लो तुम यहां, सारे  रिश्ते  निभाना  हमें  आ  गया।। रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल" मो.9452088890