दूरियाँ ही दवा हो गयी

हाय  कैसी  हवा  हो गयी। 
दूरियां  ही  दवा  हो  गयी।। 

बाद मुद्दत के जो थी मिली, 
सब दुआएं खफा हो गयी। 

कैसी  नाजुक   हुई जिंदगी, 
मौत  की  मेहरबां हो गयी। 

तेरे   कूचे से  मेरा गुजरना, 
जान  पे ही  बला हो गयी। 

जाँ  लुटाती  रहीं  वादियां, 
अब सभी बेवफा हो गयी। 

"लाल" प्यासे  रहे  झील में, 
ये सजा आज क्या हो गयी।। 

 रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल" गोपालगंज,आजमगढ़

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