शाम ढली बस रात नहीं है

शाम  ढली  बस, रात  नहीं है।
आज नयी  यह  बात  नहीं है।।

आंख दिखाकर झुका वो देगा,
यह  उसकी  औकात  नहीं  है।

दोपहरी  भी,    रात     लगेगी,
गर दिल  में  जज्बात  नहीं  है।

छू  लो बढ़कर  मंजिल अपनी,
समय का शह  है मात नहीं है।

जीवन है  इक   प्रबल साधना,
खुशियों   की  बारात  नहीं  है।

रंग  लहू  का   सदा  "लाल" है,
कोई    इसकी   जात  नहीं  है।

दे  दूं  कैसे  दिल   का   टुकड़ा,
देश   मेरा   खैरात    नहीं    है।

रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"
गोपालगंज , आजमगढ़,
मो. 9452088890

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