ना मस्जिद ना गिरजाघर ना हमें शिवाला देना
ना मस्जिद ना गिरजाघर ना हमें शिवाला देना।
भूखा गरीब हूँ साहब सिर्फ हमें निवाला देना।।
काटी है जिन्दगी हमने , बेबसी के अँधरो में,
सूरज न सही कम से कम,दिये का उजाला देना।
उनके वायदों पर जिंदा हूँ,आज भी अब भी,
उसने सीखा कहां से, इस तरह हवाला देना।।
वो तो बुजदिल अनारी हैं,उसे क्या पता साहब,
चालबाजी आपकी है,हथियार और माला देना।।
चाबियाँ किस्मत की,गिरवी पड़ी है उनके पास,
हमें याद है"लाल"सिर्फ,तकदीर पर ताला देना।।
रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"
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