जैसा बोया काट रहा है
थूक थूक कर, चाट रहा है।
जैसा बोया, काट रहा है।।
नफरत की इक लंबी खाई,
खुद खोदा, खुद पाट रहा है।
रखना मत उम्मीदें उससे,
रख्खा क्या, जो बांट रहा है।
लेकर जुगनूँ की अंगड़ाई,
सूरज को अब डांट रहा है।
सर्वश्रेष्ठ कहलाने खातिर,
अपनी जड़़ ही छांट रहा है।
कैसा अब वह, हुआ बावला,
बिन गलती के डांट रहा है।
लाल चकित ना होना उससे,
उसका ऐसा ठाट रहा है।।
रचना-लालबहादुर चौरसिया "लाल"
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